Pollution Deaths India: भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन इस रफ्तार के साथ एक ऐसा संकट भी बढ़ रहा है, जिस पर न तो उतनी चर्चा होती है और न ही उतनी गंभीरता दिखाई जाती है. यह संकट है प्रदूषण. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने हाल ही में चेतावनी दी है कि भारत में प्रदूषण से होने वाला नुकसान किसी भी अंतरराष्ट्रीय टैरिफ या व्यापारिक बाधा से कहीं बड़ा है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि इस पर नीति और समाज दोनों स्तरों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा. उन्होंने कहा कि, आज भारत में प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है.
कई वैश्विक और राष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक, देश में हर साल करीब 17 लाख लोगों की मौत प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हो जाती है. यह भारत में होने वाली कुल मौतों का लगभग 18% है.
प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने दावोस में भारतीय मीडिया से बात करते हुए पॉल्यूशन को भारत के लिए टैरिफ से ज्यादा बड़ा खतरा बताया है. उन्होंने कहा कि जब नए कारोबार और आर्थिक विकास की बात होती है, तो चर्चा ज्यादातर व्यापार, टैरिफ और नियमों तक सीमित रहती है, जबकि प्रदूषण को उतनी अहमियत नहीं दी जाती. प्रदूषण से होने वाली बीमारियों में सांस से जुड़ी समस्याएं, दिल के रोग, स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर समस्याएं शामिल हैं. यह आंकड़ा कई बड़ी बीमारियों से होने वाली कुल मौतों से भी ज्यादा है.
प्रदूषण का असर सिर्फ इंसानी सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है. अनुमान के मुताबिक, भारत को हर साल करीब 30 लाख करोड़ रुपये का नुकसान प्रदूषण की वजह से उठाना पड़ता है. इसमें इलाज पर होने वाला खर्च, कामकाजी दिनों का नुकसान, उत्पादकता में कमी और समय से पहले मौतों के कारण होने वाला आर्थिक नुकसान शामिल है. आसान शब्दों में कहें तो प्रदूषण भारत की विकास यात्रा में एक अदृश्य ब्रेक की तरह काम कर रहा है.
हार्वर्ड की प्रोफेसर का कहना है कि अक्सर सरकारें और इंडस्ट्री टैरिफ, व्यापार युद्ध और वैश्विक नीतियों को सबसे बड़ा आर्थिक खतरा मानते हैं. लेकिन, अगर आंकड़ों को देखा जाए, तो प्रदूषण से होने वाला नुकसान इन सभी खतरों से कहीं ज्यादा गहरा और परमानेंट है. टैरिफ बदल सकते हैं, नीतियां सुधर सकती हैं, लेकिन प्रदूषण से बिगड़ी सेहत और खोई हुई जिंदगियां वापस नहीं लाई जा सकतीं.
प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर गरीबों, बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है. शहरों में जहरीली हवा, गांवों में ठोस ईंधन से निकलने वाला धुआं और औद्योगिक इलाकों में जहरीले रसायन, ये सभी मिलकर स्वास्थ्य असमानता को और गहरा कर रहे हैं. बच्चे कम उम्र में ही अस्थमा और फेफड़ों की समस्याओं का शिकार हो रहे हैं, जबकि बुजुर्गों के लिए यह खतरा और भी जानलेवा साबित होता है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतना बड़ा नुकसान होने के बावजूद प्रदूषण को वह प्राथमिकता क्यों नहीं मिलती, जिसकी यह हकदार है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण का असर धीरे-धीरे सामने आता है, इसलिए यह तुरंत दिखने वाले संकट की तरह नजर नहीं आता. इसके अलावा, आर्थिक विकास और सुविधा की दौड़ में पर्यावरण और सेहत को अक्सर पीछे छोड़ दिया जाता है.
आगे क्या रास्ता है?
अगर भारत को सच में मजबूत और विकसित देश बनना है, तो प्रदूषण को सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आर्थिक आपातकाल के रूप में देखना होगा. साफ एनर्जी, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, सख्त नियम और आम लोगों की जागरूकता ये सभी मिलकर ही इस साइलेंट किलर को रोका जा सकता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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