Donald Trump Iran war political risk: क्या अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सेना को ईरान की जंग में झोंककर खुद के और पार्टी के पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी है. यह बात हम नहीं, खुद उनके सीनियर एडवाइजर (वरिष्ठ सलाहकार) कह रहे हैं. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सैन्य हमले का फैसला किया, जबकि उनके कुछ वरिष्ठ सलाहकारों ने निजी तौर पर उन्हें चेतावनी दी थी कि यह जंग कहीं आगे बढ़ सकती है और यह नवंबर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है. रॉयटर्स के अनुसार यह जानकारी व्हाइट हाउस के दो सीनियर अधिकारियों और ट्रंप सरकार के करीब एक रिपब्लिकन नेता ने दी.
चलिए जानते हैं कि रिपोर्ट में क्या दावा किया गया है, ट्रंप और उनकी पार्टी को यह जंग कैसे डेंट दे सकती है और क्या ट्रंप ने वाकई संविधान का उल्लंघन किया है.
वैसे तो अमेरिका के इतिहास में ऐसे किसी बड़े हमले को वाशिंगटन में विदेश नीति के सख्त रुख वाले लोगों से लगभग पूरी तरह समर्थन मिला है. वे लंबे समय से तेहरान की सत्तावादी सरकार को गिराने का सपना देखते रहे हैं. लेकिन व्हाइट हाउस के कुछ अधिकारी चिंतित हैं कि यह विदेश नीति का जोखिम भरा कदम रिपब्लिकन पार्टी की कांग्रेस पर पकड़ बनाए रखने की संभावना को नुकसान पहुंचा सकता है. अभी कई अमेरिकी वोटर विदेश के युद्धों से ज्यादा महंगाई और रोजमर्रा के खर्च को लेकर चिंतित हैं.
इस रिपोर्ट के अनुसार हमलों से पहले, ट्रंप बार-बार यह जानकारी मांग रहे थे कि यह सैन्य कार्रवाई अमेरिका के अंदर उन्हें मजबूत नेता के रूप में कैसे दिखा सकती है. वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, उनके शीर्ष सलाहकारों ने चेतावनी दी थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास यह साफ गारंटी नहीं है कि हमला शुरू होने के बाद टकराव को आगे बढ़ने से रोका जा सकेगा. उन्होंने यह भी कहा कि इससे सरकार अपनी राजनीतिक किस्मत को एक अनिश्चित स्थिति से जोड़ रही है. अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप ने अंत में उन लोगों की बात मानी जो मानते थे कि कड़ा और निर्णायक कदम उन्हें मजबूत नेता के रूप में दिखाएगा, भले ही इससे लंबे समय में जोखिम क्यों न हो.
रिपोर्ट के अनुसार मध्यावधि चुनावों से पहले जनता की भावना को ध्यान में रखते हुए, व्हाइट हाउस के अधिकारी और ट्रंप के सलाहकार राष्ट्रपति से कह रहे थे कि वे स्वास्थ्य सेवाओं और महंगाई जैसे मुद्दों पर ध्यान दें, क्योंकि यही चीजें अमेरिकी लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. और ट्रंप ने हमले से चार दिन पहले दिए गए अपने भाषण में भी इन मुद्दों पर जोर दिया था. लेकिन जब शनिवार, 28 फरवरी को अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो दिखा कि ट्रंप की यह रणनीति फिलहाल बदल गई है. ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान चार से पांच हफ्ते तक चल सकता है. शायद उससे अधिका भी. उन्होंने यह भी कहा कि आगे और अमेरिकी सैनिकों की मौत हो सकती है. उन्होंने ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिकों को उतारने की संभावना से भी इनकार नहीं किया है.
बता दें कि फरवरी के एक सर्वे के अनुसार लगभग 58% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से असंतुष्ट हैं. इसलिए रिपब्लिकन पार्टी को अपने मुख्य समर्थकों की भारी संख्या में उसके पक्ष में वोट देने की जरूरत होगी, ताकि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में बढ़त न ले सके. व्हाइट हाउस के अधिकारी यह भी आकलन कर रहे हैं कि अगर ईरान के साथ युद्ध लंबा चला, सैनिक मारे गए और तेल-गैस महंगा हुआ, तो इससे जनता का समर्थन और कम हो सकता है.
सूत्रों के अनुसार, व्हाइट हाउस को लगता है कि प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव) की कई सीटें ज्यादा खतरे में हैं, क्योंकि वहां रिपब्लिकन पार्टी की बढ़त बहुत कम है. राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां मतदाताओं की थोड़ी सी शंका भी चुनाव का परिणाम बदल सकती है. जनवरी के महीने ट्रंप ने सैन्य अभियान चलाकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया था. खास बात थी कि इस कार्रवाई से अमेरिका में ज्यादा राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं हुई और कोई अमेरिकी सैनिक भी नहीं मरा. लेकिन तब भी जनवरी की शुरुआत के बाद से ट्रंप की लोकप्रियता 42% से गिरकर 39% रह गई.
रिपोर्ट के अनुसार विश्लेषकों का कहना है कि अगर युद्ध छोटा रहा और ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ दे तथा नई सरकार बने, तो लोग इसे सकारात्मक रूप से देख सकते हैं. लेकिन अगर युद्ध लंबा चला और बहुत से अमेरिकी मारे गए, तो प्रतिक्रिया नकारात्मक हो सकती है. ट्रंप के समर्थक भी विदेशों में बढ़ते हस्तक्षेप से चिंतित हैं. ट्रंप का यह फ्लिप-फ्लॉप लोगों को समझ न आ रहा. एक तरफ वे खुद को “शांतिदूत” कहकर नोबेल पीस प्राइज मांग रहे थे तो अब वे खुद को एक आक्रामक सैन्य रणनीतिकार के रूप में पेश कर रहे हैं.
ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध को लेकर अमेरिका में बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने संविधान का उल्लंघन किया है. अमेरिकी संविधान के अनुसार युद्ध घोषित करने का अधिकार केवल संसद के पास होता है. हालांकि 1973 का कानून- War Powers Act राष्ट्रपति को आपात स्थिति में सीमित सैन्य कार्रवाई करने की अनुमति देता है, खासकर तब जब अमेरिका पर हमला हुआ हो या तुरंत खतरा हो. ट्रंप और उनके विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका को ईरान से “तुरंत खतरा” था, इसलिए कार्रवाई जरूरी थी. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि उन्होंने यह साफ नहीं बताया कि ऐसा कौन-सा तत्काल खतरा था जिससे तुरंत युद्ध शुरू करना जरूरी हो गया.
एपी की रिपोर्ट के अनुसार विश्लेषक डेनियल शापिरो का कहना है कि आमतौर पर राष्ट्रपति जनता और संसद को पूरी जानकारी देते हैं कि युद्ध क्यों जरूरी है और उसका लक्ष्य क्या है, लेकिन ट्रंप ने ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं किया. इस बीच खुद रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी भी ईरान युद्ध की आलोचना कर रहे हैं और डेमोक्रेट सांसद रो खन्ना के साथ मिलकर कांग्रेस में प्रस्ताव लाने की बात कही है, ताकि ईरान के खिलाफ युद्ध पर औपचारिक वोट कराया जा सके. कानून के अनुसार अगर यह लड़ाई 60 दिनों से ज्यादा चलती है तो ट्रंप को कांग्रेस से अनुमति लेनी होगी, इसलिए अब बहस इस बात पर है कि क्या यह कार्रवाई संविधान के दायरे में है या नहीं.
'नीति का प्रचार, लेकिन ट्रंप से दूरी', अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन से पहले रिपब्लिकन की नई रणनीति
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