
अमेरिकी के राष्ट्रपति चुनाव में महज 3 दिन बाकी (US Election) बचे हैं. 4 नवंबर को चुनाव है. डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trum) और कमला हैरिस के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है. दोनों ही रैलियों के जरिए वोटर्स से अपनी आखिरी अपील करने में जुटे हैं. लेकिन एक बात जो अमेरिकी वोटर्स और पॉलिटिकल ऑब्जर्वर्स को परेशान कर रही है, वह यह है कि अगर कमला हैरिस जीत गईं तो क्या होगा. ट्रंप आखिर क्या करेंगे. पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ये दावा करते रहे हैं कि अगर उनको चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा तो ये सिर्फ डेमोक्रेटिक हस्तक्षेप की वजह से होगा. इससे यह चिंता बढ़ गई है कि ट्रंप फिर से रिजल्ट पर संदेह जता सकते हैं, ऐसा ही उन्होंने साल 2020 में किया था. उन्होंने जो बाइडेन की जीत को चुनौती देने की कोशिश की थी.
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ट्रंप ने सितंबर में मिशिगन में हुई रैली में कहा था, ''अगर मैं हारा तो मैं आपको बताऊंगा कि यह क्यों संभव हुआ, क्योंकि वे धोखा देते हैं. हमें हराने का यही एकमात्र तरीका है." अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव के लिए पेश किए गए नए सुरक्षा उपायों का मकसद नतीजों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश की संभावनाओं को कम करना है.

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साल 2020 में डोनाल्ड ट्रंप की हार के बाद उन्होंने और उनके सहयोगियों ने कई मुकदमों के जरिए इलैक्शन रिजल्ट को चुनौती देने की कोशिश की, हालांकि वह चुनावी परिणामों को बदलने में कामयाब नहीं हो सके. उन्होंने अपने पक्ष में वोट ढूंढने के लिए जॉर्जिया के अधिकारियों पर दबाव डाला. इतना ही नहीं ट्रंप के सहयोगियों ने उपराष्ट्रपति माइक पेंस को बाइडेन की जीत का ऐलान करने से रोकने की कोशिश करते हुए 6 जनवरी, 2021 को यूएस कैपिटल पर धावा बोल दिया था. हालांकि, इस चुनाव ट्रंप के पास वो पावर नहीं है, जो उनके पास साल 2020 में थी. ये परिस्थितियों में एक अहम बदलाव है.

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ट्रंप 5 नवंबर को हार जाते हैं तो उनके सहयोगी चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए एक्टिव हो गए हैं. कमला हैरिस की जीत का स्थिति में, वह कानूनी रास्ते अपना सकते हैं. इतना ही नहीं ट्रप अपने समर्थकों के बीच हैरिस की जीत की वैधता पर शक पैदा कर सकते हैं. इसके परिणाम संभावित रूप से अप्रत्याशित हो सकते हैं.

रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ने अनुमान जताया है कि वोटों की गिनती कई दिनों तक चल सकती है. अगर ट्रंप पिछड़ते दिखे तो वह धोखाधड़ी का आरोप लगा सकते हैं और जनता में वह चुनाव अधिकारियों के प्रति विश्वास को कम करने की कोशिश कर सकते हैं. जिससे संभावित रूप से विरोध प्रदर्शन भड़क सकता है.
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